चमार या दलित नीच क्यों होते है? क्या सचमुच ये नीच है या फिर महान।

चमार ( दलितों ) को नीच क्यों समझा जाता है, और ब्राह्मण, ठाकुरों का इसमें क्या हाथ है?

दोस्तो अगर आप चमार, वाल्मीकि या ऐसी किसी जाति से आते है जिसे दलित समाज कहा जाता है। तो आपके मन मे एक सवाल जरूर आया होगा की आखिर हमसे ( दलितों ) से ही क्यों समाज से सभी वो काम करवाए जाते है जिसे लोग नीच कार्य कहते है। और जिसके कारण लोग दलितों से छूआछुट करते है।

और दलितों की इस हालत का जिम्मेदार हमेशा से ठाकुरों और ब्राह्मण लोगो को बताया जाता है। मगर जब पूछा जाता है की ऊंची जाती वालों ने क्या जुल्म किए तो सिर्फ इतना सुनाई देता है की दलितो का शोषण किया। कैसे किया पता नहीं।

इसके आलवा वर्तमान मे वेद-पुराण को भी इसका जिम्मेदार बताया जा रहा है और इस वक्त देश मे जय भीम-जय मीम के नारे बुलंद किए जा रहे है। तो सच मे दलितो की इस हालत की जिम्मेदार हिन्दू समाज है , या कोई इतिहास की गलती या फिर कोई गौरवशाली इतिहास।

chamaar nich kyo hote hai?


दलितों का दलित होना किसकी गलती है? या फिर ये खुद ही दलित बने। 

 इस बात को तो सभी जानते है की अंग्रेजों से पहले 1000 साल तक भारत पर मुसलमानो ने राज किया। और आज के दलितों के हिसाब से उन्होने दलितों के साथ कुछ नहीं किया।
मगर राजपूतों और ब्राह्मण ने दलितो का शोषण किया। कुछ अजीब नहीं लगता मे ये नहीं कहता की इन ऊंची जाती वालों ने कुछ नहीं किया है।
शोषण तो किया है क्योंकि हमने देखा है और सहा है मगर उस शोषण के सामने हम सच्चाई से मुह नहीं मोड सकते। आजकल देश मे दलित हिंदुओं के देवी देवताओ और वेद पुराण का खूब अपमान कर रहे है।

मतलब साफ है की धीरे-धीरे दलित मुसलमानों के यार बनते जा रहे है। मतलब जिन्होने तलवार के दम पर सलवार नहीं पहनी अब वो खुशी-खुशी पहनने लगे है। 

दलित पिछड़े थे मगर नीच काम करना दलितों ने खुद शुरू किया। आखिर क्यों?

जी हाँ सही सुना आपने की दलितों ने नीच कार्य करना खुद शुरू किया था, ब्राह्मण और ठाकुरों ने तो उसे जारी रखा बस। चलिये तो जरा इतिहास पर नजर डालते है जिसे हमसे छुपाया गया।
दर असल  जब पूरे भारत पर नाबाबों का शासन था तब आपको तो पता ही होगा की हिन्दू लड़कियों की मंडिया लगती थी। और इन हिन्दू लड़कियों मे दलितों की लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा होती थी।

ऊंची जाती बाली लड़कियों की संख्या कम इस लिए होती थी या तो वो महिलाए लड़ाई मे भाग लेती थी या समूहिक जौहर (खुद को जिंदा जालना ) कर लेती थी मगर क्योंकि दलितों की लड़कियां पिछड़े इलाके या आदिवाशी छेत्र की होती थी जिनहे लड़ाई करना या तलवार चलना नहीं सिखाया जाता था इसलिए उनकी संख्या बहुत ज्यादा होती थी।

अफगानिस्तान की इक मशहूर दीवार पर लिखा है  'दुख्तरे हिन्दोस्तान, नीलामे दो दीनार मतलब हिन्दुओ की लड़कियों को  हमने दो दो दिनार में बेचा है। 

तो चलिये अपने मुद्दे पर आते है इसी परंपरा के तहत भारत के नाबाबों ने एक कानून बनाया की उनके सशित इलाके मे किसी भी दलित के घर कोई नई बहू आएगी वो अपने शुरू के तीन दिन नाबाब के घर रहेगी। मतलब नाबाब के साथ सोएगी।
कुछ ही दिनों मे ये कानून पूरे भारत मे लागू हो गया।

अब दलित विरोध कर नहीं सकते थे और अपनी बहू बेटी को नाबाब के विस्तार पर भी नहीं भेज सकते थे। इसलिए दलितों ने एक योजना बनाई और नाबाब के पास गए और कहा की-

नाबाब साहब हम अपनी बहू को तीन दिन आपके साथ छोडने पर खुशी-खुशी तैयार है। मगर आपके घर आने से पहले हमारी कुल देवी की पूजा करेगी, फिर आपके पास आएगी।
****मुख्य जानकारी ****
नाबाब मान गया फिर उन दलितों ने एक देवी बनाई और उसे सूअर की बलि दी और उस सूअर के खून को एक थाली मे इक्कठा कर नई दुलहन का गृह प्रवेश करवाया।

ऐसा करके दलितों ने अपनी इस परंपरा का प्रचार किया ताकि नाबाब और अन्य दलित लोगो को पता चल जाये। क्योंकि मुसलमानो मे सूअर का नाम लेना भी हराम है, और ये नई दुल्हन तो अपने पैर सूअर के खून मे रखकर आ रही थी। तो भला कैसे नाबाब उसे अपने पास आने देता।

जब यह बात नाबाब को पता चली तो उसने ये परंपरा 24 घंटे के अंदर बंद करवा दी थी मगर दलितो को ये हथियार मिल गया था जिसे उन्होने जारी रखा। अब नाबाबों ने कुछ हद तक नई बहूओ से संबंध बनाना तो बंद किया मगर उन नाबाबों ने उनसे अपनी गंदगी साफ करवाने ( और ऐसे कार्य जो हिन्दुओ को नीचा और ठेस पहुँचाने बाले हो ) का कार्य शुरू कर दिया।

और इस तरीके से दलित समाज अपनी बहू बेटियों और अपने धर्म बचाने के चक्कर मे खुद ही फस गया। जब ऐसा करते करते बहुत साल गुजर गए, दलितो ने इस काम को अपनी किस्मत मान लिया तब और हिन्दू शासकों ने भी दलितों से ऐसे कार्य करवाना शुरू कर दिया।

और तब से ही छूआछुत और दलितो का मंदिर ओर अन्य पवित्र जगहो पर जाने पर पाबंदी लगना शुरू हो गयी। तो हमें ये लगता है की  हजारो साल हर तरह के दुखो को सहकर हमने अपने धर्म को बचाया जिसमें काले-गोरे, दलित ब्राह्मण सभी ने मिलकर हमारे महान धर्म सनातन को बचाया।
मगर आज कुछ लोगो की उल्टी सीधी बातें सुनकर हमने अपने धर्म और अपने अपनों को छोड़ दिया है। और ये सनातन समाज टुकड़ों - टुकड़ों में बांटता जा रहा है।

तो कुल मिलाकर दलित और चमार वो थे जिनहोने धर्म और अपनी बहू बेटियों की इज्जत की खातिर ये शुरू किया था मगर ऐसा करने की सजा उन्हे आज तक भुगतनी पढ़ रही है। अब आप ही बताए की दलित और चमार नीच थे है या उन्होने अपने गौरव को बचाने के लिए ये किया। 

अब आप ही बताए की पहले के दलित और आज के जय भीम-जय मीम बाले दलित मे से कौन सही है और कौन गलत। 

अगर आपको ये जानकारी पसंद आई है और आप चाहते है और ऐसे ही टॉपिक पर जानकारी चाहिए तो शेयर करे और उस सच्चाई को लोगो तक पाहुचाए जो हमें आसानी से किताबों मे पढ़ने को नहीं मिलती किताबों  मे सिर्फ कुछ खास लोगो के गुणगान के अलावा और कुछ भी नहीं है।

Newest
Previous
Next Post »

2 Please Share a Your Opinion.

Click here for Please Share a Your Opinion.
samir sardana
admin
11 October 2019 at 08:58 × This comment has been removed by a blog administrator.
avatar
samir sardana
admin
11 October 2019 at 08:58 × This comment has been removed by a blog administrator.
avatar